Tuesday, June 15, 2010

मनमौजी के आंसू !!!
गली गली मैं तुझे ढूंढ रहा !!! नाम पता तेरा पूछ रहा !!! किस नम्बर पर करूँ टेलीफून !!! दिल में तलाश तेरी सिर पर जूनून !!! अफला....अफला.......अफला तून अफलातून............ मैं हूँ अफलातून !!!
पिछले महीने हमे वो एक दावत में मिले थे !!!
उनकी काया कि विशाल गोलाई देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि देश में खाने पीने कि चीजों कि महंगाई में इजाफा क्यों होता जा रहा है !!!
उन्हें हम बरसो से जानते है !!!
वे कहते है कि फकीर कि गाली , औरत के थप्पड़ और विदूषक के मजाक का कभी बुरा नहीं मानना चाहिए और परायी दावत में तो खूब दबा कर खाना चाहिए !!!
लेकिन अब उन्हें देख कर हम हैरत में पड़ गए !!!
पहले तो हम उनको पहचान ही नहीं पाए !!!
आप एक विशाल चट्टान को एक मरियल से टीले के रूप में देख कर कैसे पहचान सकते है ?
अगर उन्होंने हमारा हाथ न थामा होता, तो हम उनके पास से ही गुज़र जाते !!!
आश्चर्य से हमारा मुहँ खुला का खुला रह गया !!!
माफ़ करना हम आपको उनका नाम तो बताना ही भूल गये जनाब मनमौजी साहब !!!
आज हम उनको ही खदेड़ रहे है !!!
ओह हो !!!
माफ़ करना कृपया आप हमारे इस स्लिप ऑफ़ फिंगर को नज़रंदाज़ करे !!!

हमारे कहना का आशय यह था की आज हम उनके ही दर्द से आपको रूबरू करवा रहे है !!!
वे फीकी मुस्कराहट के संग बोले :- अफलातून !!! सब इस चटोरी जुबान कि वजह से हुआ है !!!
उस दावत में जिसमे हम और तुम मिले थे वह हमारी आखरी दावत थी !!!
दरअसल उस पार्टी में खाना इतना लजीज बना था कि हम अपने पर काबू नहीं रख पाए !!!
खाते रहे !!! खाते रहे और इतना खाया कि घर पहुँचते ही पेट ने विद्रोह कर दिया !!!
परेशान घरवाले हमें एक L P Truck में डालकर दवाखाने ले गये !!!
हमे ठीक से याद नहीं पर शायद उस दिन मिनी ट्रक हड़ताल पर थे !!! और कोई फायदा भी नहीं होता क्योकि हम उसमे आते भी नहीं !!!
उसी वक़्त हमे देख !!!
डॉक्टर ने ढोल बजाकर यह घोषणा कर दी कि अगर आज के बाद आलू ,चावल , अचार , पापड़ , मावा , मिष्ठान , पूड़ी , परांठे , मिर्च के कोफ्ते , समोसा , कचौड़ी , कलाकंद जैसा कुछ खाया तो हमारी आत्मा काया का पिंजड़ा छोड़ कर तुरंत गायब हो जाएगी !!!
फिर क्या था ? घरवाली ने सब बंद कर दिया !!!
बस अब थोडा सा घास फूस खाने को मिलता है !!!
चार महीने में ही सूख कर काँटा हो गए है !!!
हमने कहा :- भाभी जी ने जो कुछ भी किया वह आपकी सेहत के लिए किया अथवा आपकी भलाई के लिए ही किया है !!!
यह सुनते ही उनकी आँखों में आंसू छल छला आये !!!

बोले :- यार अफलातून !!!
वह तो ठीक है , पर ऐसा जीना भी क्या जीना !!!
एक जमाने में, मैं मनमौजी शहर का नामी चटोरा था !!! यूँ ही मेरा नाम मनमौजी नहीं पड़ा !!!
मैं आज भी बता सकता हूँ कि शहर कि किस गली में

गरमागरम जलेबियाँ किस वक़्त मिलती है !!!
टमाटर के कोफ्ते कहाँ बनते है ?
कौन सा हलवाई बाल्टी भर मिर्च के पकोड़े बनाता है जो दो घंटे में साफ़ हो जाते है !!!
किस चौराहे पर पपड़ी और आलू का साग मिलता है , जहां शहर वाले भुखमरो कि तरह टूट पड़ते है !!!

नारियल की !!! काजू की !!! खोये की बर्फी कहाँ बनती है ? और रबड़ी के लच्छो का तो कहना ही क्या ?
कौन सा हलवाई है जो मावे को मंदी आंच पर भूनकर ऐसी सुनहरी बर्फी बनाता है जिसे खाकर स्वर्गीय आनंद प्राप्त होता है !!!
मुझे यह भी पता है की किस गली में कितने नम्बर की दूकान पर खस्ता गोलगप्पे चाट मिलते है !!!
और किस मंदिर के सामने भेल पूड़ी और पावभाजी का ठेला लगता है !!!
पराठे वाली गली में कब ? कितने बजे ? आलू का पराठा बनता है !!! कब गोभी का पराठा बनता है !!! कब मेथी का परांठा बनता है !!! और कितने बजे आलू नान , बटर नान बनता है ?
लेकिन हाय !!! अब सब कुछ हवा हो गया !!! घरवाली दावतों में जाने नहीं देती !!! फ्रिज पर ताला लगाय रखती है !!! सब छूट गया !!! लेकिन इस पापी जुबान का क्या करूँ ? इतना कह कर वो रो पड़े !!!
हम समझ नहीं पा रहे थे की इस शहर में हम मनमौजी के आंसू को कैसे रोके ?
दरअसल उनकी बात सुनकर हमारी भी जुबान लपलपाने लगी थी !!!
विशेष अनुरोध :- यदि आप लोग अपने घर में कभी कोई उत्सव !!! शादी विवाह !!! पार्टी इत्यादि का गठन करे तो दो न्योते जरूर भेजे मनमौजी और अफलातून को !!! एक बार सेवा का मौका अवश्य दे !!!
हम है रही प्यार के फिर मिलेंगे चलते चलते.....धन्यवाद !!!

Wednesday, May 19, 2010

देहाती ज्ञान !! दे हाथी ज्ञान !!

अरे............... ऐ रामअवध ....ऐ रामदुलारी !!!

अरे ....................औ.. भौजाई कहाँ हो ? अकेल अकेल कहाँ जात बाणु .....तनी रउवा संग बतिया ला शहरिया से आये है ...!!!

मिश्र जी ....का मर्दवा तुहू जौन हउवा ना.... लावा तनी चुनौटी - वुनौटी दा ढेर दिन हो गईल बानी शुर्तियाँ खाए !!!

अरे ऐ............ संग्ठा ले आवा ऐहरे ले आवा आपन घटियवा तनी बैठल जाई..और पिंकिया कि अम्मा से तनी कह दा कि दुई चार लोटा गुड का रस बना ले आजले मिल बैठकर सब लोगन गुड का रस पियल जाई ! कहो कैसा पिलान है ?

रामअवध :- कहो भैया पाणे चाय वाला ! का बात है ? आज बड़े ही खुश दिख रहे हो ? कौनो बिशेष बात भैय्ल का !

पाण्डेय चाय वाला : अरे हाँ भैया ! आज हम देहाती ज्ञान देंगे तुमका !

रामअवध :- ऐसा क्या ? ता फैकिये पाणे भैया ! हम तुम्हरे साथ है और पूरा गाँव तुम्हरे साथ है !
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लीजिये साब ...."देहाती ज्ञान" ! अब इसको यह मत कहना की "दे हाथी ज्ञान" !

आप हमारी तस्वीर देखकर अंदाज़ा लगा सकते है की हम कैसे हाथी है ?

गलती से छींक भी मार दोगे तो पतंग जैसे गंगन विहार करने लगेंगे हम !

भला इस "विकास दर" के माहौल में हाथी भी पचास किलो का रह गया है अब तो कुछ करो ! बहरहाल ,

विकासदर
हम डॉ मनमोहन सिंह , प्रणब मुखर्जी , और मोंटेक सिंह आहलुवालिया जैसे अर्थशास्त्री तो है नहीं , हम तो भारत देश में रहने वाले सामान्य नागरिक है !

अभी तक तो हमारा प्रवेश "इंडिया" तक में नहीं हुआ है ! अब देहाती क्या जाने अंग्रेजी ?

लुटियन के टीले पर रहने वाले मानव रत्नों के बारे में तो हम सात जन्मो तक नहीं पहुँच सकते ! अलबत्ता हम भी इसी देश के सभ्य नागरिक है , संविधान की मोटी पुस्तक में वर्णित अधिकार हमारे पास भी है !

हम भी चौराहे पर खड़े होकर किसी को भी गरिया सकते है ! किसी के खिलाफ लिख सकते है !

इसके बावजूद हमे "विकास दर" का गणित अभी तक समझ नहीं आया ! पीएम् साब कह रहे है की गरीबी हटाने और युवाओ को रोज़गार देने के लिए दस फीसदी विकास दर की आवश्यकता है !

हम तो मोटी सी बात यह समझते है की इसका अर्थ है इस साल जितनी आपकी आमदनी है , उसमे दस फीसदी इजाफा हो जाये तो आपकी विकास दर दस प्रतिशत हो गयी !

लेकिन साब ऐसा होता है ?
हमारे देश में तो विकास दर की गतियों में भी उतना ही अंतर है ,जितना सिविल लाइंस और गरीबों की कच्ची बस्ती की सड़कों में !

एक तो एकदम फिल्म तारिका के कपोलों की तरह चिकनी और दूसरी किसी उजाड़ बंजर मैदान की तरह खुरदरी !

जहां तक विकासदर की बात है वो भी उतनी ही असंतुलित है की पूछो मत !

अपने चुकंदर मल का बेटा छछूंदर सरकारी आरक्षण पाकर सिविल सर्वेंट बन गया ! दो बर्ष में ही चुकंदर जी के ठाठ हो गये ! टाट के कपडे की जगह मखमल के परदे लग गए ! खुरदरी खादी की जगह बंगाली मखमल के कुर्ते बन गए ! चना - सत्तू की जगह काजू - किशमिश चबाने लग गए ! राम कसम ऐसी विकासदर तो विकासशील देशो की भी नहीं थी !

अगर कोई आदमी थर्ड हैण्ड मोपेड की जगह लक्जरी कार खरीद ले , तो आप उसकी विकास दर की कल्पना कर सकते है ?

ज़मीन - जायदाद का अवैध धंधा करने वालो की विकासदर को देखिये ! कल तक जुगाड़ चलाने वाले को आज "बी एम् डब्लू " में बैठा देख............... हमे गश आ गया !

विकासदर देखनी है तो अपने नेता और जन प्रतिनिधियों को देखिये ! विकास दर का अध्ययन करना हो तो उत्तरप्रदेश की रानी बहन जी का अध्ययन कीजिये ! विकासदर की असीमित गति तो भ्रष्टाचारी अफसरों के घर देखी जा सकती है !

बहरहाल , सुयोग्य पुत्रियों के ईमानदार पिता मनमोहन सिंह एक पढ़े लिखे अर्थशास्त्री की तरह देश के विकासदर की बात करते है ! तो हमे थोड़ी हैरत होती है ...हैरत इसलिए की अब उन्हें इस देश का प्रधानमन्त्री बने काफी अरशा हो गया है ! अब तक तो उन्हें भी इस देश के भ्रष्ट अधिकारियों , बेईमान नेताओ ,और चालबाजो की विकास दर दिखाई देने लगी होगी !

नहीं तो , हम उन्हें उस प्रदर्शनी में लेकर चल सकते है जिसके लिए एक शायर दुष्यंत ने कहा है

" कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,हमने पूछा नाम तो बोला :- हिन्दुस्तान ! "

रामअवध :- का कह रहे हो भैया ! ऐसा गज़ब खेला होत है शहरिया में....
ए भैया अब कि बार हमका भी लिवा चलो शहरिया अपने संगे !

पाण्डेय चाय वाला :- हुमम म म म म म !

का बोलते हो आप ले आवे इनको शहरिया ?

Friday, May 14, 2010

पाण्डेय चाय वाला !!!

लीजिये हुज़ूर संभालिये ! एक दम पुराना और बासी प्रोडक्ट लेकर आया हूँ ! अब ताज़े कि उम्मीद तो मुझसे कीजियेगा नहीं क्योकि अपने धंधे का एक ही उसूल है "बासी माल टिकाना ताज़ा माल छिपाना"

हाँ ! तो साब और मेमसाब कौन सी चाय पियेंगे रामदुलारी चाय , राम बिसारी चाय , रामकली चाय , लाची वली चाय , बिना लाची वाली चाय, स्पेसल चाय !

समोसा , कचौड़ी , पकौड़ी , गरमा गरम टिक्की सौ प्रतिशत बासी कि गारंटी के साथ !

जी जनाब ....यस सर ....हाज़िर महोदय !!!

जनाब , जब हम तीसरी क्लास में पढ़ते थे तो प्रार्थना के बाद पहले पीरियड में क्लास टीचर महोदय हमारी हाजरी लेते थे !

वे बोलते - गंगुलाल ! तो "गंगू" उठकर बोलता - उपस्थित महोदय !
"गंगू" यह शब्द बोलता तो "नंगू" यस सर कहता !
"प्रेमू" हाज़िर जनाब बोलता तो "नरेश" जी हाँ श्रीमान कह कर अपनी उपस्थति दर्ज करवाता !

अर्थात कक्षा में पूरी तरह लोकतंत्र विद्यमान था !

लेकिन कभी कभी कोई अकडू अध्यापक आता तो वह सभी को एक जैसे शब्द बोलने पर मजबूर कर देता जैसे "उपस्थित हूँ गुरुदेव"!

कक्षा में हाजरी के समय उपस्थित रहना ऐसा अनुष्ठान था जैसे पाणिग्रहण संस्कार के वक़्त वर वधू का !

कक्षा में हाज़िर रहने वालो कि संख्या प्रतिदिन नब्बे प्रतिशत से ऊँची रहती थी !
बाद में स्कूलों के मॉनिटर अर्धविश्राम के बाद भी हाजरी लेने लगे !
कॉलेज में तो हर पीरियड में ही उपस्थति ली जाती थी ! यहाँ ज्यादातर बच्चे गायब रहते थे और विषय प्राध्यापक अक्सर उनके अनुपस्थित रहने पर भी उपस्थति लगा देते !

तब स्कूल - कॉलेज के रजिस्टर को सच्चा दस्तावेज माना जाता था !

एक बार हम अपने चंट दोस्तों के साथ सलीमा देखने चले गए ! वहाँ दोस्तों ने सलीमा कर्मचारी को बिना डिटर्जेंट के धो दिया !

पुलिस केस हुआ ! लेकिन हम उस पुलिसिया चक्कर से इसलिए बच गए क्योंकि अध्यापक जी ने रजिस्टर में हमारी हाजरी लगा रखी थी ! यानी उस वक़्त हम सलीमा घर में नहीं वरन कक्षा में मौजूद माने गए !

लेकिन अब देखिये कक्षाओ में छात्रों को जाने के लिए बेचारे मंत्री महोदय को छात्रों को बोनस अंक देने पड़ रहे है !

क्या आप बता सकते है कि छात्र कक्षा में क्यों नहीं आते ?

इसलिए नहीं कि वो पढना नहीं चाहते ! दरअसल उन्हें ढंग से पढाया नहीं जाता ! गुरु जी को कालेज में राजनीति करने से फुर्सत मिले तो पढाये ! गुरूजी परनिंदा में डूबे रहते है !

वे इस बोर तरीके से पढ़ाते है कि बच्चे उनकी कक्षा में ऊँघने से बेहतर मेरी कैंटीन में बैठ कर बासी समोसा और स्पेसल चाय पीना ज्यादा पसंद करते है !

हमारी मित्रा ,सखी, सहेली.... संगीता जब बीच सत्र में अपनी पढाई से संन्यास लेने कि घोषणा कि तो हमने उसको सत्र पूरा करने के बारे में समझाया !

उत्तर में संगीता हमसे प्रश्न कर बैठी - अबे मलीहाबादी आम !

( कृपया आप इस संबोधन शब्द को नज़रंदाज़ करे ! वो स्नेहवश मुझको मलीहाबादी आम कहती है वो ह्रदय कि बुरी कतई नहीं है ! )

मैं क्यों पढूं ? ना तो मुझे पढाई में रस आता है, ना गुरु जी हमको ढंग से पढ़ाते है , ना इस पढाई से मेरा कोई लाभ होने वाला है , जब पढने से कुछ भी हासिल नहीं तो मैं क्यों पढूं ?

यह सवाल तो ऐसे था जैसे जून कि दोपहर में कोई आग जला कर तापे !

तो साब चाहे कितना भी कर लो पर जब तक ससुर पढने में आनंद नहीं आएगा , पढने से फायदा नहीं होगा ! कौन पढने में रुचि लेगा भला ? आग लगा दो क्लास को !

पर कुछ भी कहो अपना बासी माल बिकता तो खूब है !

अपील :- शिक्षा जगत में सुधार कीजिये मंत्री महोदय अन्यथा ब्लैक बोर्ड होंगे ! सीटे होंगी ! अध्यापक होंगे ! रजिस्टर होंगे पर जी जनाब ! यस सर ! हाज़िर महोदय ! हाँ श्रीमान बोलने वाले विद्यार्थी नहीं होंगे !!! होगा तो सिर्फ पाण्डेय चाय वाला ..........

एक बार सेवा का मौका अवश्य दे ! आज नकद कल उधार !
पिछला हिसाब clear कर दीजिये साब !

Wednesday, May 12, 2010

खीर पूड़ी !!!

कोई सही शीर्षक नहीं मिल रहा था सोचा क्यों ना खीर पूड़ी का एक पहलू बता दूँ आपको कि हमारे बड़े बुजुर्ग क्यों कहते थे की बंद मुठ्ठी लाख की और खुल गयी तो ख़ाक की !

इसीलिए पुराने लोग अपनी तिजोरी और संदूक किसी को नहीं दिखाते थे !

सामने वाला अंदाज़ा ही लगाता रहता की इस तिजोरी में कितना माल है, चाहे उसमे रुपयों की जगह रद्दी कागज ही क्यों ना भरे हुए हो !

हम एक ऐसे सेठ जी को जानते है जिनके बारे में यह प्रसिद्द था की उनके पास बड़ा भारी धन है लेकिन जब वे मरे तो पता चला की उनके ऊपर लाखो का कर्जा है !

बंद मुठ्ठी कहते किसे है ? ऐसी बात जिसके बारे में अनुमान लगाना मुश्किल हो ! समझदार ऐसा तमाशा करते है की सामने वाला यह तय ही नहीं कर पता की इसमें कितना सच है और कितना झूठ !

अब देखिये अपनी नादानी से अपनी बहन जी ने अपने करिश्मे की पोल खोल दी ! अपने गले में मुसीबत की माला पहनकर ....उनके ही प्रदेश में बच्चो को शिक्षा नहीं मिल रही है क्योकि धन की कमी है किन्तु माला पहनने के लिए धन की पूर्ती भी हो जाती है !

बहरहाल , अपने यहाँ तो चमत्कार को नमस्कार किया जाता है !

महान वीर और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माने जाने वाले अर्जुन के भी इतने बुरे दिन आये कि जब वे विधवा यादव स्त्रियों को ले जा रहे थे तो उन्हें साधारण लुटेरों ने लूट लिया !

रणभूमि में अपने धनुष कि टंकार से लोगो के कान बहरे कर देने वाला अर्जुन टापता ही रह गया !

इसी हाल पर अपने चचा ग़ालिब ने कहा है - बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले .....!

हमे एक सच्ची कथा याद रही है ...एक वृद्ध दंपत्ति थे जिनके चार बेटे थे ! बूढ़े माँ बाप को कौन रोटी खिलाये, इस बात को लेकर बहुएं दबी दबी जुबान में बड़बड़ाती रहती !

उनकी मंशा भांप एक दिन बूढ़े बाप ने कहा पुत्रों ! मैं तुम्हारी माँ के साथ अलग रहना चाहता हूँ ! मैं अपना सब कुछ तुमको सौंप रहा हूँ बस यह संदूक अपने साथ ले जा रहा हूँ !

बेटे ने देखा कि पिताजी के पास इतना मज़बूत संदूक है जिसपर मोटा सा ताला लटक रहा है ! उसने सोचा इसमें जरूर जेवर दौलत है !

उसने तुरंत कहा पिताजी : आप मेरे साथ रहिये ! एक भाई कि बात सुन बाकी भाइयों के कान खड़े हो गए ! वे भी पिताजी को अपने साथ रखने के लिए उत्सुक हो गए बहुएं भी अपने सास ससुर को रोज़ रोज़ खीर पूड़ी बनाकर खिलाने लगी !

वक़्त गुज़रता गया एक दिन बूढ़ा मर गया लेकिन संदूक कि चाबी बुढ़िया को सौंप गया और बुढ़िया को समझा गया कि संदूक को भूल कर भी ना खोले ! फिर एक दिन बुढ़िया भी राम को प्यारी हो गयी तेरहवी के बाद लडको ने संदूक को खोला तो उसमे धातु के कबाड़ के साथ एक पत्र मिला जिसमे लिखा था -

बेवकूफों ! मैं जानता था तुम लोग बड़े स्वार्थी हो ! बस इसीलिए मैंने बड़े ताले वाला खाली संदूक अपने साथ रखा था ! अब इस संदूक को अपने माथे पर रख कर ज़िन्दगी भर नाचो और हो सके तो आज से ही तुम लोग भी एक संदूक रख लो ताला लगा कर ताकि कल तुम्हारे बच्चे तुमको भी अपने सिर आँखों पर बैठा कर रखे !

तुम्हारा स्वर्गवासी बाप !

तो बंधुओ ....हम तो यही कहेंगे कि अपने माता पिता कि सेवा आज से ही शुरू कर दीजिये और फिर देखिये पत्थर कि मूरत भी फीकी लगने लगेगी !

अच्छा तो चलते है खीर पूड़ी के न्यौते पर आमंत्रित करना ना भूले ! सोच क्या रहे है ...? जल्दी कीजिये !

Wednesday, April 28, 2010

'विनय' से बचो ........

'विनय' से बचो ........

( विनय भाई रसिक भाई मेहता) से हमारी मुलाकात नवरात्रि के दौरान खेले जाने वाले डांडिया समारोह में हुई थी !

हम अपनी गर्लफ्रेंड के साथ डांडिया खेल रहे थे कि अचानक

सिल्क का कुर्ता-पायजामा पहने एक अर्ध गंजे पुरुष डंडे बजाते हुए हमारे बीच में कूद पड़े और हमे एक तरफ कर के हमारी उपस्थिति में ही हमारी गर्लफ्रेंड के साथ डांडिया खेलने लगे !

हम अपना कलेजा जलाते हुए एक तरफ खड़े रहे कसम से अगर उस दिन हमारे हाथ में डांडिया के बजाय खुरपा होता तो उनके बचे खुचे बाल भी छील देते !

खेल ख़त्म होने पर हमारी गर्लफ्रेंड ही उन्हें हमारे पास लायी और

बोली - देखो विनय ...यही है विनय भाई रसिक भाई मेहता !
V.M Boutique के मालिक जिनसे मैं अपने ड्रेस लेती हूँ !

विनय भाई को देखते ही हम समझ गए कि यह पैदाइश ही रसिक है !

बहरहाल , उस दिन से हमारी विनय भाई रसिक भाई मेहता से मित्रता हो गयी ! वही विनय भाई अभी दो दिन पहले हमारे घर आये और

बोले - मैं अपना नाम बदल रहा हूँ ! हमने चौंक कर कहा क्या कहते हो विनय भाई ? आपका नाम तो इतना चोखा है ! इतना झकाश है ! इतना सोलिड है ! बिलकुल हमारे नाम से मिलता जुलता !

वे बोले - यही तो रोना है ...कि हमारा नाम बिलकुल आपके नाम जैसा है कल तक जब हम आपको नहीं जानते थे तब तक तो ठीक था किन्तु अब तो दाल रोटी के भी वांदे पड़ गए है !

जो लोग बुटिक पर आते है हमारा नाम पूछ कर ऐसे भाग जाते है जैसे हमने अपना नाम नहीं कोई विस्फोटक सामग्री का नाम ले दिया है ....

पूछताछ करने पर पता चला कि यह वही विनय है ना जो ब्लॉग जगत में लोगो को झेलाता है ! और तो और हमने सुना है विनय नाम के दो ठग भी पकडे गये है पिछले दिनों .....

विनय भाई कि बात सुनकर हम भी चक्कर में पड़ गए क्या सचमुच विनय नाम का इतना खौफ है ?

अचानक हमे विनय भाई से डर लगने लगा ! अपनी घबराहट को छिपाते हुए हम

बोले - विनय भाई ! नाम में क्या रखा है ? यह तो संयोग मात्र है ! अब देखो हमारे नाम कि विडंबना भी ऐसी ही है ! कानपुर में हमारा नामकरण हुआ बड़े प्यार से हमारी मौसी मधु पाण्डेय जी ने नाम रखा विनय पाण्डेय बड़े हुए तो हमारी कक्षा में विनय नाम के तीन छात्र थे ! दुष्कर्म वो करते थे और मरम्मत हमारी हो जाती थी !

और बड़े हुए तो विनय नाम का हमारे मोहल्ले में एक लड़का और भी था लड़कियां वो छेड़ता था फिर उस लड़की के भाई हमको लात मुक्को से छेड़ जाते थे !

पर जनाब हमने कभी बुरा नहीं माना क्योकि कभी कभी फायदा भी हो जाता था इस नाम का, हम भी सीटियाँ बजा लेते थे और फिर बज दुसरे विनय कि जाती थी !

परीक्षा में परचा खाली हम छोड़ देते थे और उसी पर्चे में हमको सबसे ज्यादा अंक भी मिल जाते थे !

और जब से ब्लॉग लिखना शुरू किया तो हमसे पहले ही यहाँ विनय नाम के दो तीन दिग्गज बुद्धिजीव मौजूद थे ! और हमारे भोले भाले पाठक आज तक Confusion में उनका नाम पढ़कर हमे पढ़ जाते है !

तो बोलिए जनाब विनय नाम के फायदे है कि नहीं , बहरहाल विनय भाई तो चले गए पर जाते जाते एक विचारणीय प्रश्न दे गए कि क्या वाकई विनय से बचो ?

अब यह तो आप जानो हमारा तो खैर नाम है ही विनय पाण्डेय किन्तु कुछ अति बुद्धिमान हमको भूत अथवा ना जाने क्या क्या समझते है !

जय राम जी कि ......

Wednesday, April 21, 2010

मंगल + पाण्डेय

मंगल + पाण्डेय

^^ घरवाली आँगन में गावे
मंगल भवन अमंगल हारी
देश के लूटा बारी-बारी
जियो बहादुर खद्दरधारी .........^^
जनाब यह मेरी सोच नहीं है , आप तो ख्वामखा नाराज़ हो रहे है ! यह तो मैंने कभी हास्य कवि सम्मेलन में सुना भर था और चिपका यहाँ भर दिया !

हुआ यूँ कि आज मैंने निर्णय लिया कि मैं मंगल कि बजाऊं.........
तो जाहिर सी बात है कि मंगल का जिक्र भी होगा !

क्या कहा ? मैं मंगल पाण्डेय कि बात करूँ !

अजी रहने दीजिये किसी फ्लॉप फिल्म कि क्या बजाए जिसकी जनता जनार्दन ने पहले ही बजा दी !

क्या ? क्या ? आप फिल्म कि नहीं उस वीर क्रांतिकारी मंगल पाण्डेय कि बात कर रहे है जिन्होंने 1857 कि क्रांति का सूत्रपात किया था !

अजी साहब उनके बारे में कुछ कहना मेरे कलम के बस कि बात नहीं है वो तो महान थे और मैं ठहरा छोटा सा जीव...

मैं बेचारे मंगल ग्रह कि बात कर रहा हूँ !
क्या पूछा आपने ? कि मंगल पर जीवन है कि नहीं ?

कमाल करते है आप भी मेरा नाम गूगल पाण्डेय नहीं विनय पाण्डेय है ! अगर मंगल पर जीवन तलाशना है तो जाइए गूगल में सर्च मारिये ...सारी जानकारी फ़ोकट में मिलेगी !

हाँ जी अब सही समझा आपने वही मंगल जिसका शादी ब्याह में उतना ही महत्व होता है जितना पंडित , मौलवी और पादरी का !

मंगल का खेल भी बहुत ऊँचा होता है ! किसी कि कुंडली में नीच का मंगल तो किसी कि कुंडली में ऊँच का मंगल !

मांगलिक कन्या के लिए मांगलिक वर ही देखा जाता है ! अगर मंगल ग्रह वधू का भारी तो वर के कैरियर कि समझो लग गयी....................... वाट !

क्षमा करे ! हमारे इस तरह के वक्तव्यों से आप यह ना समझे कि हम आजकल ब्राह्मणगिरी अथवा ज्योतिष शास्त्र का अध्यन कर रहे है !

ना जी ना ..... हमारी कुंडली में तो पहले ही शनि वक्री चल रहा है राहू घर कि तलाश में बैठा है और केतु ना जाने कब से हिचकोले ले रहा है ! हम तो बस यूँ ही मंगल के साथ दंगल कर रहे थे !

अपने देश को तो हम पहले भी कह चुके है कि हम घोंचुओ का देश मानते है ! अब घोंचू का अर्थ आपको भी बता चुके है !
लीजिये अभी पिछले वर्ष कि बात याद आ गयी हमारे मोहल्ले में एक सज्जन कि बेटी कि शादी तय हुई , कुंडली मिलान भी हुआ पता चला कि लड़की का मंगल भारी है और यह भारीपन लड़के के कैरिएर पर भारी रहेगा और इस वजह से शादी तोड़ दी गयी थी !

बहरहाल , कर्म से तो नहीं किन्तु जन्म से तो हम भी ब्राह्मण है और इतना दावे के साथ उस वक़्त हम कह चुके थे कि यह मंगल भारी तो पड़ेगा ही किन्तु वर-वधू के जीवन पर नहीं वरन समाज के दकियानूसी रिवाजो पर, कुंडली मिलाने वाले पर , भविष्य बताने वाले पर और उनके मात पिता पर जिन्होंने महज इस वजह से दो प्रेमियों को अलग कर दिया क्योकि मंगल भारी था !

और फिर हुआ भी यह ही ( वर -वधू ) दोनों ने अदालती शादी कर ली वह भी घर से भाग कर और जज साहेब को वजह बताया कि मंगल भारी था !

अब आप खुद बताइए मंगल किसपर भारी हुआ ?

यकीन नहीं मानेंगे पर बात एकदम पुख्ता है मंगल उनपर ही भारी हुआ जिनपर हमने अंदाज़ा लगाया था !

आज एक साल बाद दोनों मियाँ बीवी घर लौटे वो भी खुश साथ में एक आनेवाली खुशखबरी के .....

इसका मतलब फिर से फ़ोकट का खाना मिलेगा इस दरिद्र को !

तो भैया ...यह जो दो पैर का जंतु है ना ...इंसान यह बड़ी शातिर चीज़ है अपने कर्मो का फल ग्रहों पर डाल देता है !

अजी मंगलमुखी सदा सुखी ! मंगल तो कभी किसी का अमंगल करता ही नहीं बस यह इंसान ही है जो मंगल से दंगल करता है और नाम बेचारे मंगल का लगा देता है !

अगर मंगल को कोई आपत्ति होती तो भला नासा के लोग जो उसके पीछे हाथ धो कर पड़े है वो उनपर भारी होकर उनको सबक नहीं सिखा देता !

चलिए आप लोगों से बात करने का मूड था और कोई मुद्दा भी नहीं था तो एक मुद्दा मिला और यह ही हमारे लिए मंगल की घड़ी बन गयी !

पर अब यह नहीं पता की यह लेख हमारे लिए मंगल होगा या अमंगल और इसी चिंता में हम यहाँ दुबलाए जा रहे है !इसलिए आपलोगों से विनती है कि अपनी राय फटाफट लिख मारिये जैसी भी हो ....
देख क्या रहे हो ? सोच क्या रहे हो ?
जल्दी बताओ जी ......

Wednesday, April 14, 2010

बधाई हो .....

पन्द्रह आलू नान, तीस प्लेट शाही पनीर , अठ्ठारह गुलाब जामुन , दो प्लेट बूंदी रायता और तीन कोन आइसक्रीम ! फिर मुट्ठी भर सौंफ का मज़ा लेकर कुछ भी कहो बंधुओ मज़ा अगया !

कल रात खूब चांप कर मुफत का खाना खाए है हम ! अब तो आप भी समझ ही गए होंगे कि मैं केवल नाम का ही नहीं काम का भी ब्राह्मण है !
आप लोग सोच रहे होंगे कि किस गरीब का "बठ्ठा" बैठा होगा जिसने मुझ जैसे दरिद्र ब्राह्मण पर अपनी दयादृष्टि दिखलाई !

तो जनाब .....परसों कि बात है रात में हम सत्तू फांक कर सो ही रहे थे !

( हम जब अपने घर में खाना खाते है तो केवल सत्तू ही फांकते है क्योकि और कुछ होता नहीं है ब्राह्मण के घर में सिवाय सत्तू के ! )

तभी अचानक थाली के बजने कि आवाज सुनाई दी हम तुरंत भांप गए कि पड़ोस में राधा भाभी ने खुश खबरी दे दी !

"अब तो कल का भोजन पक्का समझो ...."

इसी उत्सुकता में हमने दरवाजा खोला और खुद भी लगे चिल्लाने अजी बधाई हो ........! लल्ला के जन्म पर बधाई हो ! लल्ली के जन्म पर बधाई हो ! लल्ला लल्ली के जन्म पर आप सबको बधाई हो ! थाली बजाओ बधावे गाओ ......

एक अरब से ज्यादा जनसँख्या वाले देश को बाल बच्चो के अधिक उत्पादन कि जरूरत है !

अजी... आप तो बिना मतलब के गरम हो रहे है ....यूँ ही आजकल पारा पैंतालीस के आस पास चल रहा है ! क्या हुआ जो हमने उत्पादन शब्द का प्रयोग कर दिया ? क्या उत्पादन सिर्फ गेहूँ , मक्का , चावल , मोठ, मटर, अरहर का ही होता है ?

हमारे देश में भोले भाले स्त्री पुरुष मिलजुलकर प्रतिदिन माफ़ करना प्रतिरात संतानोत्पादन कर रहे है ! क्या इसे उत्पादन नहीं कहा जा सकता ?

आप हमसे सहमत हो या ना हो पर हमारे देश कि विडंबना यह ही है कि लोकतंत्र ने मानव को हथियार बना दिया है एक टूल बना दिया है एक उपकरण बना दिया है !

आदमी हथियार है पैसा बनाने का , आदमी उपकरण है पैसा कमाने का ! अब तो यह कहा जा रहा है कि बढ़ी हुई जनसँख्या भी वरदान है देश के लिए और मज़े कि बात यह है कि यही लोग कुछ बरस पहले नसबंदी जैसा राग भी बजाते थे !

अब देखिये चीन में एक परिवार सिर्फ एक ही बच्चा पैदा कर सकता है ! और जापान में सरकार अपने नागरिको से कह रही है कि बच्चे ज्यादा पैदा करो ! और अपने यहाँ धडाधड जनसँख्या बढ़ रही है !

भारत कि जनसँख्या वरदान है इसलिए भी बताया जा रहा है क्योकि यहाँ कि युवा शक्ति दुनिया में सबसे ज्यादा है ! पर

भैया ......जब यह युवा बूढ़े होंगे तब क्या होगा ? पूत के पांव तो पालने में ही दिखते है ! आजकल हमारा समाज बूढ़े लोगो कि कितनी इज्जत करता है यह तो जग जाहिर है !

लोग अपने बूढे मात पिता को को उनके हाल पर छोड़ देते है ! फिर अपनी विदेशी सरकार माफ़ करना NRI सरकार भी पेंशन बंद करने में जुटी है !

इसका मतलब जब तक तू जवान तब तक तू नवाब और बूढा होते ही मर जाकर कहीं भी !

इतनी भारी जनसँख्या के पक्ष में बोलने वालो को अपना आज तो सुरक्षित और खुशहाल लग रहा है ! लेकिन कल कि तरफ वो देख ही नहीं रहे ! अब सरकार कि सरकार जाने हम तो बस इतना ही कहेंगे कि भाई ....जो भी करना है सोच समझ कर करो कहीं ऐसा ना हो कि पानी का घड़ा एक हो और पीने वाले सौ .....प्यासे ही मर जाओगे !

और मेरे पास तो बिल्कुल भी मत आना मैं खुद लोगो के बुलावे पर मुफत में पेट भर कर खाना खाता हूँ और दबा कर पानी भी पीता हूँ !